इंसानों के रंग बदलने से परेशान गिरगिट ने रंग बदलना छोड़ दिया..”संवाद” के कार्यक्रम में व्यंग्यकारों ने बिखेरे शब्दों के रंग

देवास/ मोहन वर्मा । रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर शहर की साहित्यिक संस्था “संवाद” द्वारा आयोजित व्यंग्यपाठ
में रचनाकारों ने अलग अलग विषयों पर अपने व्यंगों
का पाठ कर शब्दों के रंग बिखेरे । व्यंग्यकार संदीप भटनागर ने अपने व्यंग्य “मगरमच्छ और गिरगिट” के संवाद के माध्यम से पढ़ा- “आदमी अपने फायदे के अनुसार रंग बदलना सीख गया है । रंगों को मजहब का रंग देकर,रंगों को रंगों से लड़ाते जब देखा तो हम गिरगिटों ने भी रंग बदलना छोड़ दिया,कौन सा रंग जान की आफत बन जाए इसलिए हम बैरंग ही भले”
ओम वर्मा ने भी होली पर रंगों के बहाने राजनैतिक हालातों पर चुटकी ली ।

कार्यक्रम के शुरुवात में भावेश कानूनगो ने प्याज लहसून के परहेजियों पर लिखे व्यंग्य का पाठ किया । दीपक कर्पे ने अपने व्यंग्य में विविध अवसरों पर बजने वाले गीतों के बहाने अपनी बात कही । इसके बाद यशोधरा भटनागर ने सेवानिवृत्त लोगों को रायचंदो द्वारा दी जाने वाली सलाह पर लिखे अपने व्यंग्य का पाठ किया । युवा रचनाकार सुधीर महाजन ने अपने व्यंग्य पाठ से श्रोताओं को गुदगुदाया । सुरेंद्र राजपूत हमसफर के व्यंग्य को भी श्रोताओं की सराहना मिली ।

मोहन वर्मा ने अपने व्यंग्य अच्छी नींद के लिये घोड़े कहाँ से लाऊँ तथा ज्यादा सोचना मना है का पाठ किया । विजय श्रीवास्तव ने विभिन्न वाद चलाने वाले बुद्धिजीवियों के दोहरे चेहरों को अपने शब्दों में पिरोकर व्यंग्य के अनूठे रंग बिखेरे ।
कार्यक्रम में सीए एस एम जैन,अजय सोलंकी, अशोक बुनकर,विजय परसाई,दिनेश शर्मा, कृपाली राणा,हिमांशु कुमावत,शर्मिला ठाकुर,शुभदा बाकरे, माधवी काशीकर,अमेय कांत, आलेख वर्मा,अमित पिठवे,जयप्रकाश चौहान, जुगल किशोर राठौर, विवेक बक्षी,दिलीप बाकरे,सुरेश सोनी,भूषण अत्रे, विजय नारायण जोशी,ध्रुव नारायण जोशी,किशोर असनानी,अमरदीप सिंह सहित अनेक सुधि श्रोता उपस्थित थे ।
अंत में गुलाल और फ़ूलों की होली खेलकर कार्यक्रम का समापन हुआ ।

